नई दिल्ली: किडनी ट्रांसप्लांट के लिए लंबी वेटिंग लिस्ट और ब्लड ग्रुप मैच न होने की समस्या अब इतिहास बन सकती है। वैज्ञानिकों ने एक ऐसी ‘यूनिवर्सल किडनी’ विकसित की है जो किसी भी ब्लड ग्रुप वाले मरीज में ट्रांसप्लांट की जा सकती है। यह ब्रेकथ्रू मेडिकल साइंस में क्रांति ला सकता है, जहां हजारों लोग किडनी फेलियर से जूझ रहे हैं।
किडनी ट्रांसप्लांट में ब्लड ग्रुप की समस्या सबसे बड़ी बाधा है। सामान्यतः, डोनर और रिसीवर का ब्लड ग्रुप मैच होना जरूरी होता है, अन्यथा शरीर ऑर्गन को रिजेक्ट कर देता है। लेकिन अब, कनाडा और चीन के शोधकर्ताओं ने एंजाइम्स की मदद से टाइप-ए किडनी को टाइप-ओ में बदल दिया है। टाइप-ओ ब्लड ग्रुप यूनिवर्सल डोनर माना जाता है, जो किसी भी ब्लड ग्रुप में फिट बैठता है।
यह खोज नेचर बायोमेडिकल इंजीनियरिंग जर्नल में प्रकाशित हुई है। यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया (यूबीसी) के वैज्ञानिकों ने विशेष एंजाइम्स विकसित किए जो किडनी की सतह से एंटीजन (शुगर मॉलिक्यूल्स) को हटा देते हैं। ये एंटीजन ही ब्लड टाइप तय करते हैं। एंजाइम्स की मदद से किडनी को ‘यूनिवर्सल’ बना दिया जाता है, जिससे इम्यून सिस्टम इसे स्वीकार कर लेता है।
पहला सफल ट्रायल चीन के वेस्ट चाइना हॉस्पिटल में किया गया, जहां टाइप-ए किडनी को एंजाइम-कन्वर्टेड टाइप-ओ (ईसीओ) में बदलकर एक ब्रेन-डेड रिसीवर में ट्रांसप्लांट किया गया। परिणाम उत्साहजनक रहे- कोई रिजेक्शन नहीं हुआ। यह दशक भर की मेहनत का नतीजा है, जो अब क्लिनिकल ट्रायल्स की ओर बढ़ रहा है।
भारत में हर साल लाखों लोग किडनी रोग से पीड़ित होते हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, करीब 2 लाख लोग डायलिसिस पर हैं, और ट्रांसप्लांट के लिए वेटिंग लिस्ट में हजारों हैं। ब्लड ग्रुप मिसमैच के कारण कई डोनर किडनी बेकार हो जाती हैं। यह यूनिवर्सल किडनी तकनीक डोनर पूल को 50% तक बढ़ा सकती है, वेटिंग टाइम घटा सकती है और जानें बचा सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह तकनीक महंगी डिसेंसिटाइजेशन थेरेपी की जरूरत खत्म कर देगी, जो संक्रमण और ब्लीडिंग का खतरा बढ़ाती है। भविष्य में, यह तकनीक अन्य ऑर्गन्स जैसे लिवर या हार्ट पर भी लागू हो सकती है। हालांकि, अभी बड़े पैमाने पर ट्रायल्स बाकी हैं, लेकिन यह उम्मीद की किरण है।
यह ब्रेकथ्रू ऑर्गन डोनेशन को बढ़ावा देगा। लोग अब बिना ब्लड ग्रुप की चिंता किए डोनेट कर सकेंगे। मेडिकल कम्युनिटी इसे ‘गेम चेंजर’ मान रही है। अगर सब ठीक रहा, तो जल्द ही अस्पतालों में यह रूटीन प्रक्रिया बन जाएगी।



